बुधवार, 3 जून 2009

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री उम्मेद सिंह कलिहारी


श्री उम्मेद सिंह कलिहारी दुर्ग जिले के उन गिने-चुने लोंगो में से एक है जिन्हे 1930 के कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने का मौका मिला था । गाँधी जी के व्यक्तित्व से अभिभूत श्री कलिहारी अक्सर कहा करते थे कि मैंने अपने संघर्ष पूर्ण जीवन में भूदान,ग्राम दान तथा ग्राम स्वराज आन्दोलन में भाग लेकर संगम स्नान कर लिया । महात्मा गाँधी के पहली बार के दुर्ग आगमन पर उनसे मुलाकात को वे कभी नही भूले । 

श्री उम्मेद सिंह कलिहारी का जन्म सन् 1905 को ग्राम भरदकला में हुआ । ग्राम अर्जुन्दा में छटवीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त करने के प्रश्चात अर्जुन्दा में ही सहायक शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई । शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित हुए एवं देश प्रेम की भावना लिये आजादी के आन्दोलन में कूद पड़े और लोगों के बीच आजादी के महत्व को बताना शुरू किये । 1942 में महात्मा गांधी के करो या मरो के नारे को बुलंद करते हुए आजादी की लड़ाई में कूद पड़े । आन्दोलन अपने चरम सीमा पर था तभी श्री कलिहारी को पुलिस ने गिरफ्तार कर रायपुर सेन्ट्रल जेल भेज दिया 9 माह की लंबी सजा अगस्त 1943 तक चली  । जेल से रिहा होकर पुनः स्वतंत्रता आन्दोलन को गति प्रदान करते रहे । क्षेत्र के लोंगो को भी कलिहारी द्वारा प्रचारित आजादी की बातें समझ आने लगी इस तरह से श्री कलिहारी शिक्षकीय जीवन छोड़कर देश की आजादी के लिए अर्जुन्दा सहित दुर्ग जिले भर में कार्य करते रहे और आजादी को प्राप्त किये । 

देश की स्वतंत्रता के पश्चात देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा दिये गये आदेश के तहत श्री उम्मेद सिंह कलिहारी की पुर्ननियुक्ति अर्जुन्दा के स्कूल में ही हुई एवं आजादी के बाद दुर्ग जिला शिक्षक संघ के अध्यक्ष का दायित्व भी पूरा किया एवं कई महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान भी कराये । सन् 1955 में श्री कलिहारी संत विनोबा भावे के साथ जुड़ गये एवं उनके प्रसिद्ध भूदान आन्दोलन में सक्रियता के साथ जुड़कर विनोबा जी के हीरक जयन्ती के अवसर पर श्री कलिहारी द्वारा दुर्ग जिले के पचास हजार के लक्ष्य में सैतालिस हजार रूपये संग्रहित कर विनोबा भावे जी को भेंट किये । श्री कलिहारी हमेशा संयमित जीवन जीते रहे इनके द्वारा महात्मा गांधी के जन्म शताब्दी वर्ष की पुण्यतिथि के अवसर पर संकल्प लिये की आज से मशीन से पीसा हुआ आटा, मशीन का चावल एवं शक्कर ग्रहण नहीं करना जिसका पालन वे जीवन पर्यन्त करते रहे । वे गांधी जी से अत्यंत ही प्रभावित रहे जिसके फलस्वरूप अपने शिक्षकीय जीवन में ही उन्होनें चरखे से सूत कातना शुरू कर दिये थे । गांधी टोपी तो वे विद्यार्थी जीवन से ही पहनते थे । 
क्षेत्र के एकमात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री उम्मेद सिंह कलिहारी का देहावसान 28 अगस्त 1994 को हुआ । उनके द्वारा आजादी के पूर्व एवं आजादी के बाद देश एवं समाज के लिये किये गये सेवा कार्य को पुण्य स्मरण करते हुए सादर प्रणाम .......। 

साभारः श्री क्रांतिभूषण साहू (प्रपौत्र श्री उम्मेद सिंह कलिहारी) सरपंच,ग्राम पंचायत भरदाकला से प्राप्त जानकारी के आधार पर 

रविवार, 31 मई 2009

उस नवजात का क्या कसूर....

आज सुबह-सुबह मैं स्थानीय समाचार पत्र पढ़ रहा था । समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर छपी एक खबर को पढ़कर बहुत दुःख हुआ क्योंकि खबर ही ऐसी थी दिल दहला देने वाली । घटना का विवरण कुछ इस प्रकार था - 
पत्नी से झगड़ने और मारपीट के बाद गुस्साये एक युवक ने अपने नवजात शिशु पर मिट्टी तेल डालकर जलाने का प्रयास किया । उस नवजात शिशु को इस धरती पर आये मात्र 22 दिन ही हुये थे । उक्त शिशु को जिला अस्पताल में दाखिल कराया गया है जहां उसकी स्थिति गंभीर बताई गई है । दिल दहला देने वाली यह घटना बालोद के जवाहर पारा-खाल्हेपारा में शनिवार को हुई । 

जवाहर पारा-खाल्हेपारा झोपड़पट्टी में रहने वाले नईम कुरैशी जिसकी उम्र 28 वर्ष का अपनी पत्नी गायत्री उर्फ परवीन उम्र 27 वर्ष के साथ अक्कर लड़ाई-झगड़ा होता था । दोनों ने प्रेम विवाह किया था । घटना के दिन भी नईम और गायत्री के बीच जमकर विवाद हुआ था । नईम ने गाली-गलौच के साथ अपनी पत्नी की पिटाई करने के बाद गुस्से से खाट में सो रहे अपने नवजात शिशु पर मिट्टी तेल डालकर माचिस मारकर जलाने का प्रयास किया । गायत्री की चीख व मारपीट की आवाज सुनकर पंहुचे पड़ोसी खिलावन कुमार ने किसी तरह मासूम बच्चे को आग से हटाकर स्थानीय अस्पताल ले गया । बच्चे की स्थिति को देखते हुए डाक्टर ने फौरन ही जिला अस्पताल के लिए रिफर कर दिया । मोहल्ले के लोगों के अनुसार इस दंपत्ति के दो और संतान सुहाना और शाहीन है जिसकी उम्र क्रमशः 5 वर्ष एवं 4 वर्ष है ।

गुरुवार, 28 मई 2009

पप्पू पास हो गया...


इन दिनों विभिन्न परीक्षाओं के नतीजे इन्टरनेट पर उपलब्ध है चाहे वो बोर्ड परीक्षाओं में कक्षा पांचवीं,आठवीं का हो या दसवीं,बारहवीं का या फिर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं का । अपनी बर्षों की मेहनत को कम्प्यूटर के स्क्रीन पर देखकर कोई मायूस हो जाता है या फिर कोई चहक उठता है और उनके मुख से सहसा यह निकल ही जाता है - पप्पू पास हो गया ...।

आज कल इन्टरनेट पर रिजल्ट का असर इतना जबरदस्त हो गया है कि लोग सुबह से ही दुकान के सामने खड़े रहते हैं कोई बच्चा अपनी रिजल्ट जानने आया तो कोई पालक अपने बच्चों का । खैर अपने कर्मों का फल जानने की इच्छा तो सबको होती है ।रिजल्ट जानने की इस उत्सुकता से हमें भी अच्छा रोजगार मिल गया । उस दिन शाम को करीब सात बजे एक महिला मेरे दुकान पर अपनी पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली  बच्ची का रोलनंबर लेकर आयी और बोली की बच्ची घर में रो रही है जरा इनका नंबर देख के रिजल्ट बता दें , मैंने रोलनंबर टाइप किया और रिजल्ट सामने देखकर उसकी मम्मी बहुत खुश हुई और क्यों न हो बच्ची जो अच्छे नंबरों से पास हो गई थी करीब 93 फीसदी अंक पाई थी वो । दूसरे दिन तीन लड़कियाँ आठवीं कक्षा की रोलनंबर लेकर आई तीनों ने बारी-बारी से अपना रिजल्ट जाना...रिजल्ट पता चल जाने पर तीनों मुझे देखने लगी । मैने पूछा क्या हुआ - उनका जवाब था उनके पास मुझे देने रूपया नहीं था वो तो यूं ही आ गये थे । मैने कोई बात नहीं कहके उनको जाने दे दिया । आज ही नेट पर दसवीं का रिजल्ट आया सुबह से लोग पूछ-पूछ कर जा रहे थे मैं भी इसके लिए तैयार था मुझे भी अपने एक भांजा औऱ एक भतीजे का रिजल्ट देखना था लगभग 11 बजे रिजल्ट आ गया । रिजल्ट आते ही मैने पहला रिजल्ट भांजे का और दूसरा भतीजे का देखा भांजे ने 81 फीसदी औऱ भतीजे ने 84 फीसदी अंको के साथ परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर लिया था मैंने उन दोनों को ही मोबाइल पर सूचना दिया और मिठाई खिलाने को कहा । तीसरे ही क्रम में मैंने एक लड़की का रिजल्ट निकाला वो भी 79.8......फीसदी अंक पाई थी । रिजल्ट देखते ही उसका भाई जो उसके साथ था ने कहा-अरे हमारा तो दस हजार का चूना लग गया वो भी मात्र एक नंबर से । मैं उनके उस बात से चौंका और पूछा कि वो कैसे , जवाब में उन्होने बताया कि शासन द्वारा अनुसूचित जाति के बच्चों को 80 फीसदी अंक पाने पर दस हजार रूपये देती है । 

मैंने कई-कई लड़कों को छात्र जीवन में ही अपने प्रेमिकाओं के जाल में जकड़े पाया । किसी ने अपने अंको को देखकर कहा-ये उन्ही (उनकी प्रेमिका) के कारण इतने कम मार्कस आये हैं तो किसी ने कहा ये कहा - इतने अच्छे मार्कस उन्ही के कारण आये हैं । इन प्रेम बंधन के चक्रव्यूह में लड़कियाँ भी कहीं कम नजर नहीं आये - इन लोगों ने अपने रोलनंबर अपने प्रेमी को दे रखे थे । वे बकायदा रिजल्ट देखकर अपने प्रेमिकाओं को इसका बधाई भी दे रहे थे । खैर ये तो जीवन की उन तमाम क्षणों में से एक वाकया है जो हर किसी ने किसी की जिंदगी में आती है चाहे उसका स्वरूप कैसा भी हो ।

एक अनुरोध पाठकों सेः इस तरह का यह मेरा पहला लेख है अगर कहीं पर कोई भी गलतियाँ नजर आये तो सुधार कर पाठन करें एवं मुझे सूचित करें । धन्यवाद.

दुनिया में कहां-कहां...


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