वो मरेगा नहीं, बेहोश हो गया होगा ।
तन्हा जीने का अफसोस हो गया होगा ।।
हवा बड़ी बैचेन है, बोसुद बह रहा है ।
उसके पहलू को, शायद छू लिया होगा ।।
महक है गजब की धार में दरिया के ।
गेसूओं को अपनी, उसने धो लिया होगा ।।
नींद क्या आएगी, गमजदे को इक भला ।
याद में बोखुद, कुछ देर खो गया होगा ।।
सोडहं ये सागर खारा ही खारा है ।
किनारे बैठे कर, कोई रो गया होगा ।।
मिथलेश शर्मा निसार
ग्रामीण परिवेश में हो रही गतिविधियों को आप तक पहुँचाने का एक छोटा सा प्रयास । हमारी संस्कृति, बोली भाषा, प्रकृति, साहित्य, रहन-सहन, पहनावा, खान-पान आदि को दूर-दूर तक ले जाने में यह एक माध्यम बने । एक ठेठ भारतीय गांवो में ग्रामीण जीवन और समाज बहुत सरल है, गांव में लोगों का जीवन एवं समाजिक स्थिति लगभग एक जैसी होती है यानि एकरूपता के साथ सामाजिक जीवन जीने में ही विश्वास करते है । हर सुख-दुख में आपसी सहयोग को ही अपना धर्म मानते है ।
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
बुधवार, 11 नवंबर 2009
छत्तीसगढ़ी कविता .......................... दँदर गेन ददा .
......... दँदर गेन ददा .
जिनगी बोझहा बिकट के , दँदर गेन ददा ।
कतका रोवन रोवई मा, कँदर गेन ददा ।।
उबरे खातिर ए पीरा ले उदिम करेन ।
सरी उदिम ला करके, लथर गेन ददा ।।
दाऊ बाढ़ी का देतिस , नई दाना मिलिस ।
ऊँखर पइंया ला धर के, घिलर गेन ददा ।।
लड़बो हक के लड़ई, कहिके कम्मर कसेन ।
दुवे दिन के लड़ई मा, ढिलर गेन ददा ।।
काय सपना कलेवा के, हम हा देखन ।
सुक्सा भाजी बर घलो, सुरर गेन ददा ।।
परकम्मा पिरित बर, हम जग के करेन ।
चारो कोती मया बर, किंजर गेन ददा ।।
कतका करतेन साहन, 'पकलू' तहीं बता ।
फाँदा-फाँसी मा चढ़के, झुलर गेन ददा ।।
मिथलेश शर्मा निसार
(कवि निवास) अरजुन्दा
जिला-दुर्ग (छ.ग.) 491225
मो. 9755057245
जिनगी बोझहा बिकट के , दँदर गेन ददा ।
कतका रोवन रोवई मा, कँदर गेन ददा ।।
उबरे खातिर ए पीरा ले उदिम करेन ।
सरी उदिम ला करके, लथर गेन ददा ।।
दाऊ बाढ़ी का देतिस , नई दाना मिलिस ।
ऊँखर पइंया ला धर के, घिलर गेन ददा ।।
लड़बो हक के लड़ई, कहिके कम्मर कसेन ।
दुवे दिन के लड़ई मा, ढिलर गेन ददा ।।
काय सपना कलेवा के, हम हा देखन ।
सुक्सा भाजी बर घलो, सुरर गेन ददा ।।
परकम्मा पिरित बर, हम जग के करेन ।
चारो कोती मया बर, किंजर गेन ददा ।।
कतका करतेन साहन, 'पकलू' तहीं बता ।
फाँदा-फाँसी मा चढ़के, झुलर गेन ददा ।।
मिथलेश शर्मा निसार
(कवि निवास) अरजुन्दा
जिला-दुर्ग (छ.ग.) 491225
मो. 9755057245
शनिवार, 7 नवंबर 2009
सूपा मन चुप बइठे हें अऊ, चलनी बिक्कट बोलत हे ।
सूपा मन चुप बइठे हे अऊ,
चलनी बिक्कट बोलत हे ।
कोइली ताकत बइठे हे,
अऊ कागा आम खखोलत हे ।।
छाती के तै दूध पियाए ,
लइका के बड़ साद रहिस ,
उही दूध ला पीके बेटा,
छाती ला अब छोलत हे ।
सूपा मन ...........
मटिया कस सब खुसर-खुसर,
हमला जी फोकला कर दिन ।
परे बिपत में उही मनखे मन अब ,
हमला ठोलत हे ।।
सूपा मन ...........
दू दिन रहिके चह देहूँ मैं ,
अइसन आस बंधा रहिगे ।
मार कुंडली फन काढ़त हे ,
दुख हालत न डोलत हे ।।
सूपा मन ...........
दू कउड़ी अउकात नही तेन ,
सान देख ले 'पकलू' अब ।
हमर लिलामी होत देखके ,
अउने-पउने मोलत हे ।।
सूपा मन ...........
मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित
मिथलेश शर्मा निसार
(कवि निवास) अरजुन्दा
जिला-दुर्ग (छ.ग.) ४९१२२५
कोइली ताकत बइठे हे,
अऊ कागा आम खखोलत हे ।।
छाती के तै दूध पियाए ,
लइका के बड़ साद रहिस ,
उही दूध ला पीके बेटा,
छाती ला अब छोलत हे ।
सूपा मन ...........
मटिया कस सब खुसर-खुसर,
हमला जी फोकला कर दिन ।
परे बिपत में उही मनखे मन अब ,
हमला ठोलत हे ।।
सूपा मन ...........
दू दिन रहिके चह देहूँ मैं ,
अइसन आस बंधा रहिगे ।
मार कुंडली फन काढ़त हे ,
दुख हालत न डोलत हे ।।
सूपा मन ...........
दू कउड़ी अउकात नही तेन ,
सान देख ले 'पकलू' अब ।
हमर लिलामी होत देखके ,
अउने-पउने मोलत हे ।।
सूपा मन ...........
मौलिक/अप्रकाशित/अप्रसारित
मिथलेश शर्मा निसार
(कवि निवास) अरजुन्दा
जिला-दुर्ग (छ.ग.) ४९१२२५
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